विश्व शान्ति 1
शान्ति शब्द बहुत ही छोटा है मित्रो परंतु हर व्यक्ति,परिवार, समाज,राष्ट्र और विश्व के लिए सबसे बड़ा महत्व रखता है क्योंकि शान्ति के मार्ग से ही जीवन के सारे रचनात्मक और सकारात्मक परिणाम सम्भव हैं,अशांति तो अस्थिरता और विनाश का मुख्य कारण हैं यह पूर्ण नकारात्मक विचारों का परिणाम है।आज समस्त विश्व अस्थिरता और अशांति के दौर से गुजर रहा है वह भी तब जब हमने विज्ञान के माध्यम से अत्यधिक संशाधन और शक्ति संग्रह कर रखा हैं फिर इस अशांति का मूल कारण क्या हो सकता है।
विचारणीय है मित्रो शान्ति का सम्बन्ध सहनशीलता से है,आप कितना भी प्रेम करिए,सेवा करिए,दया रखिए,करूणा कीजिए यदि सहनशीलता नहीं है तो अशांति हो जायेगी।यह पूर्ण मनोवैज्ञानिक सत्य है आप प्रयोग करके देख लीजिए इतनी सकारात्मकता होने के बावजूद भी परिणाम अशांति ही होगा।
विश्व शांति तो बहुत बड़ी बात है जो उस मुद्दे पर वार्ता करते हैं या प्रवचन देते हैं या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सलाहकार हैं क्या उनके स्वयं के मन शांत हैं,बहुत चंद लोग मिलेगें भैया जब आपका मन ही शांत नहीं है तो शांति वार्ता कैसे करोगे और यदि की भी तो असफल होगी मन तो अहंकार,दम्भ से पीड़ित हैं,पहले मन को शांत करिए कैसे करेंगे सहनशील बनिये।सहनशीलता के साथ न्यायप्रिय होंगे तभी स्थायी शांति सम्भव है।
मित्रो यह तो हो गया सैद्धांतिक और आध्यात्मिक चिंतन शांति के लिए मन की शांति प्रथम आवश्यकता है।
शांत मन हमारे अंदर कई सारे सद्गुणों को विकसित करेगा जैसे धैर्य,विवेक,सहनशीलता इत्यादि इनमें सहनशीलता एक ऐसा गुण है जिससे आपके आसपास का वातावरण भी शांत होने लगेगा,अशांति और विपरीत परिस्थितियों में भी आप शान्त रह सकते हैं इसका मतलब यह कतई नहीं की आप नकारात्मकता को सहन करें और कुंठित या अवसादग्रस्त हो जायें यदि धोखे से यह भूल कर दी तो आप अपनी शान्ति के साथ आत्मा को भी मार देंगे अतः शान्ति के लिए समझौता नहीं करना है यदि समझौते शान्ति ला रहे हैं तो वह क्षणिक हैंं तो शान्ति के बदलाव करना हैंं आत्मा का उसको पवित्र और मजबूत बनाना और मन को शांत करना है।यह एक व्यक्ति की स्थायी शान्ति की प्रक्रिया है मित्रो एक बार यात्रा प्रारम्भ करो चिर स्थायी शान्ति मिलकर रहेगी।
प्रश्न कौन सी प्रक्रिया है भैया प्रकृति ने हमको जीवन दिया है तो जीने की कला भी दी हमने क्या किया अपना तो सत्यानाश किया ही पशुओं को भी नहीं छोड़ा,हम गिर गये इतना गिर गये की जीवन का उद्देश्य ही भूल गये क्या जिन्दगी जीना ही भूल गये।आज भी आप जंगल में जाईये हमसे अधिक अनुशासित और संगठित तो पशु रह रहे हैं अरे भैया जंगल छोड़िये शहरों में बंदरो को देख लीजिए अभी कुछ दिनों पहले की आंखो देखी घटना है एक बंदर को इलेक्ट्रिक पोल से शाॅक लगा नीचे गिरा वो भाई साहब पचास बंदर इकट्ठे हो गये उसको चारों ओर से घेर लिया बहुत देर तक पीटते रहे शायद उसकी चेतना वापस आ जाये पूरा रोड जाम कर दिया करीब 30 मिनट तक जाम रखा उन्होंने उसके बाद उसका शरीर ले गये मित्रो कहां ले गये किसी को पता नहीं,कभी किसी ने बंदर के मृत शरीर को लावारिस नहीं देखा होगा हमें उनसे शिक्षा क्या मिली उनमें संवेदना,प्रेम,संगठन, अनुशासन इत्यादि कई सारे प्राकृतिक गुण हैं और बंदर अशांति तभी फैलाते जब भूखे हों अथवा उनके परिवार का कोई सदस्य परेशानी में हो उनमें असुरक्षा की भावना हो अन्यथा कभी नहीं पशुओं में भी शान्ति प्राकृतिक है हम तो मनुष्य हैं परमात्मा की सर्वोत्तम रचना।
मनुष्य का प्राकृतिक स्वभाव शांत और संवेदनशील हैं, रचनात्मक हैं ठीक परमात्मा जैसा।
जय हिंद वन्दे मातरम्
सुधीर तिवारी
क्रमशः
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