1)
राजनीति जातिवाद
मित्रो मैं फेसबुक सामाजिक मंच पर सन् 2010 से सक्रिय हुआ था,तकनीक के वरदान और अभिशाप दोनों होते हैं परन्तु सामाजिक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में फेसबुक ने हिन्दुस्तान में एक नया आयाम खड़ा कर दिया है जिसे हम डिजिटल राजनीति कह सकते हैं।इस माध्यम से प्रचार-प्रसार बहुत आसान और सर्वसुलभ हो गया हैं, इन्टरनेट के इस युग में हर व्यक्ति कार्यकर्त्ता हो गया है और भविष्य में राजनीति में रैली,शक्ति प्रदर्शन इत्यादि जो पुराने माध्यम रहे हैं सारे लुप्त होने की सम्भावना हैंं जिससे चुनाव अत्यंत सभ्यता,शान्ति और अत्यधिक कम खर्च में सम्पन्न हुआ करेंगे।2014 और 2019 चुनाव में सोशल मीडिया का अत्यधिक प्रयोग हमे हमारे नेतृत्व से सीधे संवाद स्थापित करने में सफल रहा है और यह देश में राजनीतिक पारदर्शी व्यवस्था का आगाज है।
हमारे देश की राजनीति में जातिवाद और धर्म का प्रयोग लगातार आजादी के बाद अब तक किया जा रहा है,हर देश में किया जाता है परन्तु हमारे यहां लोकतांत्रिक व्यस्था स्थापित होने के साथ ही धीरे धीरे उसे विकृत रूप देने का प्रयास हमारे सभी राजनैतिक दलों द्वारा किया गया जिसका परिणाम उत्तर प्रदेश और बिहार में आम जनता सबसे अधिक हुआ और जातीय नफरत ने सभी जनता के अन्तर्मन को बीमार कर दिया है।
1991 में जब राजनीति में जातिवादी जहर फैलाया जा रहा था तब मैं 15 वर्ष की उम्र में इसका शिकार हुआ था परिणामस्वरूप मेरा विद्यालय बदलना पड़ा था,उसके बाद कई घटनायें हुईं परन्तु मैनें कभी भी न तो सर झुकाया और न ही जातिवादी राजनीति को समर्थन दिया क्योंकि परमपूजनीय गुरूदेव गायत्री परिवार ने कभी ऐसी शिक्षा नहीं दी और उनकी कृपा से ही यह सम्भव हुआ।
वर्ष 2002 में जीवन और मृत्यु के बीच मेरा संघर्ष चल रहा था मात्र 2% अवसर था बचने का मेरा दिल्ली के सभी अस्पतालों ने मना कर दिया था।मेरे परिवार का सबसे बुरा समय था तब मुझे कैलाश अस्पताल मे एडमिट कराया गया राजनैतिक दबाव बनाने वाले थे नवाब सिंह नागर मंत्री भाजपा उत्तर प्रदेश और वेदराम भाटी जिलाध्यक्ष भाजपा नोएडा जो दोनों गुर्जर जाति से थे ।उसके बाद डॉक्टर्स ने ब्लड प्लाज्मा की मांग की तो पहले दिन मुझे प्लाज्मा उपलब्ध कराया एक पोरवाल जी जो वैश्य समाज के हैं,बीच में एक सरदारजी मोजरवेयर कम्पनी के और सातवें और अन्तिम दिन सीताराम सिंह जो क्षत्रिय हैं।लगातार सात दिन अलग अलग जाति के लोगों ने मुझे प्लाज्मा उपलब्ध कराया और जीवनदान दिया मेरी जाति हो गयी मानव की और यह सब प्रबन्धन करने वाले श्री राकेश पोरवाल वैश्य समाज के हैं,इस घटना ने मेरे अन्तर्मन को जातीयता की राजनीति के विरोध में और दृढ़ कर दिया ।
अतऐव विगत विधानसभा चुनाव और वर्तमान लोकसभा चुनाव में आमजन के संगठित होकर जातिवादी राजनीति का विरोध कर मतदान करने से अति प्रसन्नता है।जातिवाद हिन्दुस्तान में एक राष्ट्रीय समस्या के रूप में जन्म ले रहा है जिसको परास्त करने में आंशिक सफलता जनता के संगठित होने से मिली है,यदि सभी राजनीतिज्ञ प्रजा का सहयोग करेंगे तो जातिप्रथा हमारे देश से सती प्रथा की तरह विलुप्त हो जाएगी ।
सुधीर तिवारी
जय हिंद,वन्दे मातरम्
क्रमशः
2)
क्या कहा तुमने जाति प्रथा सती प्रथा की तरह लुप्त हो जायेगी मित्रो परिवार के लोग कहेंगे ये पागल हो गया है वो भी मेरा जन्म तो ब्राह्मण परिवार में जन्म हुआ तो शतप्रतिशत कहेंगे,रिश्तेदार कहेंगे भ्रष्ट हो गया है,समाज के लोग कहेंगे नेता बनना चाहता होगा इसलिए ऐसी बातें कर रहा है,कट्टरपंथी कहेंगे मारो इसको ,राजनीति करने वाले कहेंगे जेल में डालो ये हमारा धन्धा बंद करा देगा ऐसी प्रतिक्रियाओं का सामना करना होगा ।अरे भैया ऐसा कुछ नहीं मैं ऐसा कुछ नहीं करना चाहता मैं केवल संगठित करना चाहता हूं,हर व्यक्ति को उसकी शक्ति बताना चाहता हूँ, लोकतंत्र और आधुनिक राजनीति में संगठन की शक्ति को जगाना चाहता हूँ फिर सवाल उठेगा क्यों संगठित होना चाहते होना चाहते हो? क्रान्ति करनी है,गुंडई करनी है किसी पर दबाव बनाना है।मित्रों ऐसा कुछ भी नहीं करना है हमें इसलिए संगठित नहीं होना है कि सड़कों पर उतरना है,हिंसा फैलाना है,उद्दंडता करनी है या क्रान्ति करनी है हम सब हिन्दुस्तानी लोग अनुशासित हैं हमें संगठित होना है अच्छे कामों के लिए सत्य के लिए, आपस में प्रेम और सहयोग के लिए, सामाजिक न्याय के लिए, सद्भावना के साथ आर्थिक विकास के लिए, स्वयं को शक्तिशाली बनाने के लिए, देश को शक्तिशाली बनाने के लिए, पूरे विश्व में अपनी सभ्यता और संस्कृति को सम्मानित स्थान दिलाने के लिए और सबसे महत्वपूर्ण और आवश्यक कारण होगा हम सभी का संगठित होने का कि हमारे असंगठित होने से कहीं राक्षस हमारे शासक न बन पायें,हमारा शोषण न कर पायें अर्थात हमें राजनीति में उसी को आगे बढाना हैं जो हमें संगठित रख सके।
मित्रो आजादी के बाद संवैधानिक व्यवस्था के लागू होते ही हमें बांटने का कार्य शुरू हो गया था क्योंकि स्वतन्त्रता आन्दोलन हमने संगठित होकर ही लड़ा था और आजादी की कीमत बंटवारे के साथ चुकानी पड़ी थी।आज पुनः जातिवाद और नक्सलवाद राष्ट्रीय समस्याओं के रूप में हमारे सामने खड़ा है।आज हमें परम्परागत राजनीति और आधुनिक राजनीति में एक सामंजस्य बैठाने की आवश्यकता है।हमारा देश एक अति प्राचीन व्यवस्था है पहले राजनीति नहीं होती थी नीति शास्त्र या दर्शन शास्त्र से सामाजिक व्यवस्थायें संचालित होती थीं और ये व्यवस्थायें धर्म के द्वारा नियंत्रित की जाती थीं और वह वर्णाश्रम व्यवस्था थी जिस पर हम बाद में बात करेंगे,उसके बाद राजतंत्र से व्यवस्था चली हजारों साल तक जिसमें शासकों ने अपने स्वार्थ के लिए तरह तरह की वयवसथायें लागू की उसमें से एक है जाति व्यवस्था जिसको हम जन्म से सम्बन्धित करते हैं।हमारे पूर्वजों ने उस वक्त की परिस्थितियों में क्या किया उसमें जो सर्वजन हिताय हो उसे याद रखें और जो बुरा रहा हैं उसे भूल जायें तभी हम सब मिलकर एक सुनहरे भविष्य का सपना देख सकते हैं।
आजादी के बाद हमारे समाज में फैली आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक असमानता के कारण हमारी आपस में ही लड़ाई छिड़ गयी जातियों के नाम पर और अल्पसंख्यक समाज असुरक्षा की भावना से संगठित बना रहा और जिन्होंने संगठित होकर स्वतंत्रता आन्दोलन लड़ा वो असंगठित हो गये,अपनी सकारात्मक ऊर्जा एक दूसरे को नीचा दिखाने में नष्ट की जिसके परिणामस्वरूप छोटे छोटे क्षेत्रीय राजनीतिक दलों का उदय हुआ,जिन्होंने आपके अधिकारों को चंद निजी लोगों में बांटकर राष्ट्रीय राजनीति को पतित किया और निजी स्वार्थों को सर्वोपरि रखते हुए हमें असंगठित करके लोकतन्त्र की आड़ में राजतंत्र चलाकर वंशवाद को पुनर्स्थापित करने का प्रयास किया । हमारे देश की जनता ने उनके सारे राजनीतिक प्रयासों को नकारते हुये वंशवाद को कमजोर करके अपने शिक्षित और जागरूक होने का परिचय दिया।
जाति प्रथा बहुत ही पुरानी है,वर्तमान में कहीं भी छुआछूत नहीं है यदि कोई इस तरह का कृत्य करता है तो दंडनीय है।सभी को अपने कर्म की कीमत मिलती है,और हर जाति का व्यक्ति कोई भी कर्म करने के लिए स्वतन्त्र है हमारे समाज में लगभग हर जाति संगठित है,बहुत अच्छी बात है संगठन में हमें सुरक्षा और शक्ति मिलती है,अब हमारे पास दो रास्ते हैं या तो जाति के नाम पर संगठित होकर आपस में लड़े अन्यथा धर्म के नाम पर संगठित होकर अच्छे नेतृत्व को चुनें।धर्म के नाम पर जातियों के संगठित होने में दो बाधायें बहुत बड़ी हैं एक तो अन्तर्जातीय विवाह और आरक्षण ऐसा मेरा अनुभव कहता है।आरक्षण एक संवैधानिक व्यवस्था है उस पर नेतृत्व को निर्णय करना है, असहमति से हुए अन्तर्जातीय विवाह नफरत फैलाते हैं क्योंकि हमारे देश की संस्कृति में परिवार व्यवस्था विश्व की सामाजिक वयवसथाओं में सर्वोच्च है और हमें गर्व है।आज भी हमारे यहाँ कानयकुबज ब्राह्मण, सरयूपारीय में और हम उनमें विवाह नहीं करते एक दूसरे को नीचा दिखाने का कार्य करते हैं।वैश्वीकरण के वर्तमान दौर में कुछ घंटो में हम पूरे विश्व का भ्रमण कर सकते हैं,दुनिया इंसान की मुठ्ठी में है मोबाईल में है तो मित्रों हमें क्या करना है प्रेम करना है,सहयोग करना है,एक दूसरे को नीचा नहीं दिखाना है,दो व्यक्तियों की लडाई को जातीय लड़ाई में परिवर्तित नहीं होने देना है अन्ततः संगठित रहना है,शक्तिशाली बनना है राष्ट्र को शिक्षित और शक्तिशाली बनाना है।
संघं शरणम गचछामि ।
जय हिंद वन्दे मातरम् ।
सुधीर तिवारी
क्रमशः
3)
संघं शरणम गचछामि ।
मित्रो संगठित हो जाओ,क्या बात कर दी आपने हमारी सामाजिक व्यवस्था असफल है वर्तमान में हम सैकड़ो वर्षों से जातियों के नाम पर बटे हुये हैं।आपस में एक दूसरे से नफरत करना,हर शक्तिशाली और संगठित समाज द्वारा असंगठित और कमजोर का शोषण करना यही धर्म बन गया है,आज एकाकी परिवार व्यवस्था आयी है जिसमें दो सगे भाई आपस में प्रेम से नहीं रह सकते हैं और आप संगठित होने की बात करते हैं।ऐसा बिल्कुल नहीं है मित्रो आप ध्यान से गहराई में देखिये पूर्वोत्तर की व्यवस्था के सारे अभिशाप वरदान के रूप में परिवर्तित हो रहे हैं,हमें शासकों ने कर्म के आधार पर विभिन्न जातियों में विभाजित किया कि हम उनके विरोध में संगठित न रहें,हमने क्या किया अपनी परिवार व्यस्था विवाह और अन्य संस्कारों से सुरक्षित कर ली और समाज में छोटे समूहों में संगठित होकर अपने अपने समाज को सुरक्षित रखते हुये भारतीय संस्कृति को संरक्षित करने का महान कार्य किया।सभी को साधुवाद क्योंकि आपने देवताओं वाला कार्य किया अपनी सभ्यता,संस्कृति और संस्कारों को संरक्षण देने के लिए संगठित हो गये,आपने देश आजाद कराया संगठित होकर स्वतन्त्रता दिलायी और क्या किया आपने आधुनिक शिक्षा का अनुसरण करके अत्यधिक परिश्रम करके सामूहिक रूप से देश को विश्व में एक सम्मानित स्थान पर ला कर खड़ा कर दिया लगभग हर क्षेत्र में वो भी केवल 72 सालों में धर्म और संस्कृति को सुरक्षित रखते हुए आप धीरे धीरे संगठित बने रहे अतः निश्चित रूप से सभी ने देवताओं वाला कार्य किया है मित्रो संगठन की शक्ति को पहचानो।अभी अभी 2019 मेंं आपने क्या किया एनडीए के नेतृत्व में मात्र 45% संख्या संगठित हुयी और परिणाम आज देश मेंं स्थिर और मजबूत सरकार चुन ली अब हो सकता है जिसको आपने चुना है वही आपको विभाजित करने लगें अपने निजी स्वार्थों के लिए,मेरे देवताओं आपको क्या करना है और संगठित हो जाना है 45% को बढ़ाकर 80%कर देना धर्म के नाम पर लेकिन असुरों को तो हराना ही है जीवन ही एक देवासुर संग्राम है,असुरों का शासन हमारे देवताओं ने कभी स्वीकार नहीं किया है हम भी नहीं करेंगे उन्होंने युद्ध किये ये हमारा सौभाग्य है कि हम लोकतांत्रिक व्यवस्था के अन्तर्गत हैं हमें लड़ना नहीं है हमें केवल संगठित रहना है धर्म के लिए देश के लिए और सबसे महत्वपूर्ण अपने कल्याण के लिए अपनी अगली पीढ़ी के लिए हमें ऐसा करना ही होगा ।
मित्रो हमारी वैदिक व्यस्था को जातिवादी रूप देकर उसे पूर्णतः सामाजिक,आर्थिक और राजनीतिक विकृत रूप दे दिया हमारे पूर्वोत्तर शासकों ने जो वर्तमान में हमारे असंगठित होने सबसे महत्वपूर्ण कारण है इन सबसे ऊपर है ईश्वरीय व्यवस्था जिसके अन्तर्गत परिवर्तन प्रकृति का नियम है और उसी नियम के अनुसार हमें स्वतन्त्रता के साथ हमें लोकतांत्रिक व्यवस्था मिली जिसमें हर व्यक्ति समान अधिकार धारण करता है।
भ्रष्टाचार और निजी स्वार्थों के चलते राजनीति ने उसे विकृत रूप देकर हमें सवर्ण, पिछड़ा, दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक विभिन्न वर्गों में विभाजित कर दिया और नफरत फैलाने का प्रयास किया और आपके अधिकारों को चन्द लोगों में बांट दिया क्योंकि आप असंगठित थे।अब हम देवता असुरों की राजनीति का शिकार नहीं होंगे हम संगठित रहेंगे धर्म के नाम पर और देश के कल्याण के लिए मित्रो हम पहले कोशिश करेंगे की हम 45% से 80% संगठित हों आपसी मतभेदों को त्यागकर हमें संगठित होना ही उसके बाद हम 100% संगठित होने का प्रयास करेंगे देवताओं की संख्या बढायेंगे ।
जय हिंद वन्दे मातरम् ।
सुधीर तिवारी
क्रमशः
4)
मित्रो पूर्व के लेखों में हमने संगठित होने की बात पर बात की क्योंकि सारे महान और रचनात्मक कार्य संगठन की शक्ति से ही सम्भव हुये हैं,अब समस्या यह आती है कि हम संगठित क्यों हो संगठित तो भेड़ें होती हैं शेर तो अकेला चलता हैं अरे भाईयो एवं बहिनों भेड़ों के संगठित चलने का उद्देश्य भोजन और सुरक्षा होता है हमारे संगठन का उद्देश्य देश और धर्म की रक्षा होगा क्योंकि उनके सुरक्षित होने से हमारी सुरक्षा सुनिश्चित हो जायेगी और हम प्रगतिशील हो जायेंगे अब सवाल यह आता है कि यह सैद्धांतिक लक्ष्य तो हर संगठन और राजनीतिक दल रखता है पर व्यवहारिक रूप में हमारी सद्भावनायें जो देवताओं के सिद्धांत से मिलती हैं उनको मतदान के रूप में परिवर्तित करके पुनः आम जनता पर शासक बनकर विभाजन का सिद्धांत लागू कर देते हैं और हमारा शोषण प्रारम्भ हो जाता है ऐसी व्यवस्था के हम सभी आदी हो गये हैं।अब ऐसा हम नहीं होने देंगे क्योंकि हम लोकतांत्रिक व्यवस्था के महत्वपूर्ण अंग हैं अब हम शिक्षित और जागरूक नागरिक हैं,हम केवल चुनाव के दौरान ही जागरूक और सक्रिय नहीं रहेंगे हम प्रतिदिन सूचना के माध्यमों से अपने अधिकारों,धर्म,संस्कृति, राजनीति और देश के प्रति जागरूक रहेंगे और नकारात्मकता से दूर रहते हुये हर जनप्रतिनिधि के कार्य और आचरण का तार्किक और व्यवहारिक विश्लेषण अवश्य करेंगे,हम राजनीतिक रूप से हमेशा जागरूक और सक्रिय रहेंगे।मित्रो बिना राजनीति के एक परिवार की व्यवस्था भी नहीं चल सकती है अतः हम अपने परिवार प्रबन्धन की व्यवस्था के अनुसार राजनीतिक विश्लेषण अवश्य करेंगे,परिवर्तन होके रहेगा यदि हम अच्छे उद्देश्य के लिए संगठित रहेंगे यही संगठन की शक्ति है।
अब सवाल यह है कि हमारे संगठित होने में बाधा क्या है तो मित्रो सबसे बड़ी बाधा है हमारा जातिवाद जो वर्तमान में एक राष्ट्रीय समस्या बनती जा रही है,दूसरी बाधा है आरक्षण व्यवस्था, तीसरी बाधा है असहमति से हुये अन्तर जातीय विवाहों से सामाजिक विद्वेष,चौथी बाधा है जातिगत लड़ाईयां और ऐतिहासिक पूर्वाग्रह इत्यादि छोटे छोटे कई कारण हैं।हमारे देश का इतिहास अति प्राचीन और गौरवशाली होने के नाते हमें परम्परागत राजनीति और आधुनिक राजनीति में एक सामंजस्य बैठाना होगा सारे हल निकल आयेंगे,आधुनिक राजनीति में हमारा समाज संवैधानिक रूप से तीन तरह विभाजित है सामान्य वर्ग, पिछड़ा वर्ग और दलित /आदिवासी समाज और इन तीनों को एक सूत्र में बांधने का कार्य धर्म करता है अतः धर्म का अनुसरण पारदर्शिता के साथ यदि कराया जाय तो हमारी सामाजिक एकता को कोई नुकसान नहीं पहुंचा सकता है और यह कार्य हमारे धर्मगुरु करने में सक्षम हैं अब यदि हमारे राजनेता निजी स्वार्थों को त्यागकर आरक्षण व्यवस्था जिसका मूल उद्देश्य सामाजिक,आर्थिक और राजनीतिक रूप से पिछड़े समाज को देश की मुख्य धारा से जोड़ना है,उस व्यवस्था को पारदर्शी बनाकर उसके मूल उद्देश्य पर केन्द्रित करें तो हमारी एकता स्थायी और अखंड हो सकती है।परन्तु हमारे धार्मिक,सामाजिक और राजनीतिक नेतृत्व से ऐसी आशा अभी तक सम्भवतः कोई नहीं करेगा क्योंकि उनकी तो दुकानें बंद हो जायेंगी तब उस स्थिति में यह कार्य आम जनता को ही करना होगा और आपके हथियार क्या होंगे शिक्षा, जागरूकता, आपस में प्रेम मतलब सहनशीलता,स्वस्थ प्रतिस्पर्धा जिनसे हम संगठित रहकर ईमानदार,जिम्मेदार और देशभक्त जनप्रतिनिधि ही चुनेंगे धीरे-धीरे व्यवस्था परिवर्तित हों जायेगी ।
अब हम बात करेंगे असहमति से हुये अन्तर जातीय विवाह समाज और परिवार में विघटन करते हैं मित्रो आज भी हमारे देश की 80% आबादी ग्रामीण क्षेत्र में रहती है और 20%आबादी जो शहरों में गांव-देहात से जुड़ी है और हमें गर्व है कि लगभग 99%आबादी हमारे परम्परागत संस्कार और संस्कृतियों का पालन करती है और आज भी विवाह हमारे देश में दो परिवारों का आपसी जुड़ाव होता है,जिसने भी एकाकी परिवार व्यवस्था को अपनाया है वह अवसादग्रस्त है।अतः मित्रो हमें करना है असहमति से हुये अन्तर जातीय विवाह से बचना है और यदि होते हैं तो विवाद नहीं होने देना हैं, यह संवेदनशील है हमारे देश में समझदारी से हल निकालना है या तटस्थ रहना है।जातीय लड़ाई जो दो व्यक्तियों के बीच की लड़ाई होती है जमीन के कारण,धन के कारण, अहंकार या क्रोध अन्य कई कारण होते हैं जो जातिवादी झगड़े के रूप में परिवर्तित हो जाते हैं उनसे बचना हैंं या तटस्थ रहना है,हम संगठित होकर रहेंगे ऐसा मन में भाव रखने से ही आधी समस्यायों पर विजय प्राप्त कर लेंगे।
ऐतिहासिक पूर्वाग्रह पर अगले लेख में
जय हिंद वन्दे मातरम् ।
सुधीर तिवारी
क्रमशः
5)
ऐतिहासिक पूर्वाग्रह का प्रयोग जातिवादी राजनीति में सर्वाधिक किया गया है जिसके परिणामस्वरूप उत्तर प्रदेश और बिहार गन्दी राजनीति के शिकार होकर आज बीमारू राज्यों की श्रेणी में आ गये क्योंकि उन्हें संगठित नहीं रहने दिया गया और विभाजित करने में सर्वाधिक प्रयोग पूर्वाग्रह का किया गया उदहारण के तौर पर ब्राह्मणों ने गलत शिक्षा दी,क्षत्रियों ने शोषण किया,वैश्य समाज ने लूट लिया सभी ने शूद्र समाज का शोषण किया।मित्रो मैं मानता हूँ कि हमारे पूर्ववर्ती व्यवस्थाओं में राजतंत्र व्यवस्था थी बाहुबल सर्वोपरि था अतः पारदर्शिता नहीं थी हिंसा,षड्यंत्र और पारिवारिक व्यवस्थाएं हावी थीं अतः हर शक्तिशाली व्यक्ति कमजोर का शोषण करता था,आपस में युद्ध,अहंकार की लड़ाईयां होती थीं।संभवत हमारी व्यवस्थायें पतित और विकृत रूप ले चुकीं थीं जिसके परिणामस्वरूप सैकड़ों वर्षों तक हम गुलाम रहे और गुलामी के दौरान शासकों ने अपने निजी स्वार्थों के लिए हमारी सभ्यता संस्कृति और व्यवस्थाओं को अत्यधिक विकृत रूप दे दिया जिसका मुख्य उद्देश्य था कि हम संगठित न रहें हम कमजोर रहें।मित्रो जब जातिवाद की बात आती है तो हमारी वर्णाश्रम व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न लगाये जाते हैं मित्रो जातिवाद हमारी राजतंत्र की उत्पत्ति है जिसमें पचासों जातियों में हमें विभाजित किया गया पहले कर्म के अनुसार फिर निजी स्वार्थ के चलते जन्म के अनुसार अब जन्म के अनुसार कार्य विभाजन निश्चित रूप से प्रतिभा का शोषण और सामाजिक बुराई के रूप में स्थापित हो गया।
मित्रो वर्णाश्रम व्यवस्था हमारे ॠषियों द्वारा प्रतिपादित की गयी वैदिक सामाजिक व्यवस्था है और आज भी पूरा विश्व उसी व्यवस्था के अनुरूप कार्य कर रहा है अतः हमारी वैदिक व्यवस्था ॠषियों के हजारों वर्षों के शोध के उपरांत प्रतिपादित हुई है और आज भी उतनी ही जीवन्त है,दैवीय है और सदा सत्य है,सार्वभौमिक है उसी आधार पर हमारे आचार्यों ने वसुधैव कुटुम्बकम का सूत्र दिया था।मित्रो हमारी वर्ण व्यवस्था में गुण कर्म और स्वभाव के अनुसार ही चार वर्णों में हमें विभाजित किया गया है।भगवान् श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भागवत गीता के अठारहवें अध्याय में इसका वर्णन किया है जो वेदों का सार है कृपया पढ़ें तो आपके बहुत सारे भ्रम दूर हो जायेंगे और मैं चुनौती देता हूँ पूरे विश्व के ज्ञानियों को कि हमारी उस व्यवस्था को गलत सिद्ध कर के बताओ सारा विश्व आज भी उसी दर्शन के अनुरूप विभाजित और क्रियान्वित है और यह सत्य है कि पूरे विश्व में शक्तिशाली लोग कमजोर का शोषण कर रहे हैं।मित्रो जो ज्ञान,त्याग, करूणा,सत्य,दया के मार्ग पर चलते हुये समाज को शिक्षित और दिशानिर्देश देते हुये सर्व कल्याण हेतु आविष्कारों में अपने जीवन का अधिकतम समय देता है वह ब्राह्मण हैं, जो शूरवीर,नेतृत्व करने वाला,मनुष्यता और धर्म की रक्षा के लिए सहर्ष बलिदान को तैयार वह क्षत्रिय है,जो कृषि कार्य,व्यापार और अर्थव्यवस्था के द्वारा मानवता और विश्व के कल्याण के लिए रोजगार सृजन करे वह वैश्य और जो इन तीनों के अनुसार कार्य करे वह शूद्र वर्ण है और इनका जन्म से कोई सम्बन्ध नहीं है और मैं शतप्रतिशत आत्मविश्वास के साथ कह सकता हूँ कि समस्त विश्व इन्हीं वर्णों में विभाजित है ये है हमारी वैदिक व्यवस्था और हमें इस पर गर्व है।मित्रो हम इतना विवरण सहित चर्चा इसलिए कर रहे हैं क्योंकि हमें परम्परागत राजनीति और आधुनिक राजनीति में एक सामंजस्य बैठाने की आवश्यकता है तभी हम संगठित हो सकते हैं।आज सभी हिन्दुस्तानियों को श्रीमद्भागवत गीता पढ़ने की आवश्यकता है जिससे हम अपनी संस्कृति को करीब से समझ सकें और गौरवान्वित होकर संगठित रह सकें और यदि ऐसा नहीं करोगे तो पुनः महाभारत करो और सामाजिक,मानसिक और आर्थिक गुलाम बनने को तैयार रहो।अतः सभी संकल्प लें कि हम पूर्वाग्रहों को त्यागकर संगठित रहेंगे और राष्ट्रीय समस्या जातिवाद को अपने समाज,देश और विश्व से समाप्त करने में अपना योगदान देंगे।
जय हिंद वन्दे मातरम् ।
सुधीर तिवारी
क्रमशः
6)
मित्रो पिछले पांच अंको में हमने कई बिन्दुओं पर विचार करते हुये आधुनिक भारतीय राजनीति में राष्ट्रीय समस्या के रूप में इस्तेमाल हो रही हमारी सामाजिक जाति व्यवस्था पर चिन्तन किया और निष्कर्ष यह निकाला कि यदि हम संगठित हो गये तो हमारा शोषण न्यूनतम होता जायेगा।अभी वर्तमान के चुनाव परिणाम मात्र 45% संगठित होने का परिणाम है कि नेतृत्व दबाव में है पर वह हमें संगठित नहीं देखना चाहता है मित्रो एक तरफ हमसे मतदान की अपील धार्मिक एकता के नाम पर करता है बंगाल में सत्ता पक्ष के खिलाफ जय श्रीराम के नारे का प्रयोग करता है संगठित करने के लिए दूसरी ओर धर्म के नाम पर वजीफा और कट्टरपंथी शिक्षा को बढ़ावा देने की घोषणायें करना हमारे शीर्ष नेतृत्व को कटघरे में खड़ा करता है और हमारे शासन की पारदर्शिता को संदेहास्पद करता है,यह पूर्ण अलोकतांत्रिक है और अदूरदर्शी है।अब भविष्य की राजनीति में हमारे पास विकल्प क्या हैं पहला विकल्प है 45%के विरोध में 55%संगठित हो जायें लेकिन हमारे क्षेत्रीय दल परिवारवादी नेतृत्व,बाहुबली नेता,जातीय संगठन, धार्मिक संगठन इत्यादि जो धन से प्रबंधन किये जाते हैं वो ऐसा होने नहीं देंगे और हमें नफरत के साथ पूंजीवाद का शोषण झेलना ही होगा।दूसरा विकल्प यह है कि 45% को बढ़ाकर 80%धार्मिक एकता करते हुए परिवारवाद और जातिवाद को नकारते हुये ईमानदार,जिम्मेदार सर्वधर्म समभाव राष्ट्रवादी वर्तमान से बेहतर विपक्ष बनाया जाय जिसमें योग्य वंशवादी राजनीतिज्ञ धरातल से जुड़े हुए और देशभक्त उद्योगपति भी शामिल हों केवल राष्ट्र प्रथम वाली जमीनी संगठन बनायी जाये तो जो परिस्थितियां उत्पन्न हो रही हैं उनसे निपटा जा सकता है और कोई रास्ता नहीं है।मित्रो हमारा लक्ष्य 80% संगठित होने का है,20% स्वयं सही हो जायेंगे यही संगठन की शक्ति अतः संगठित बनो,शिक्षित बनो,शक्तिशाली बनो मेरा वादा है मित्रो यदि ऐसा कर लिया तो शतप्रतिशत सत्यमेव जयते होगा हिन्दुस्तान पूरे विश्व में सम्मानित होगा,महान बनेगा आप महान बनेंगे आपकी अगली पीढ़ियां और महान होंगी,सभ्य होंगी ।
जय हिंद वन्दे मातरम् ।
सुधीर तिवारी
7)
मित्रो अब बात करेंगे कि 80%लोग संगठित कैसे होंगे ये कार्य असंभव है ऐसा नहीं हो सकता है ये मानसिकता हमारे जेहन में स्थायी रूप ले चुकी है क्योंकि हम लगभग 1000 साल गुलाम रहे हैं अपनी सारी ऊर्जा अपने अपने अस्तित्व को बचाने में ही लगाते रहे हैं और जब आजादी मिली तो सवर्ण,पिछड़ा और एससी/एसएसटी में बंटकर अपनी रचनात्मक ऊर्जा लड़ने में नष्ट की परिणाम में लोकतन्त्र की आड़ में राजतंत्र खड़ा हो गया।अब वक्त आ गया है संगठित होने का 80% और उसके लिए हमें गुरू की आवश्यकता होगी तो नजर उठा कर देखिए गुरू हमारे आसपास ही हैं बस हमें उनसे सीखना है कौन हैं गुरू वही जिन्होंने अपने बुद्धि कौशल से आप पर राज किया है मित्रो हम गुरू बनायेंगे ईसाईयों को विश्व का सबसे बड़ा समुदाय है भिन्न भिन्न मत हैं उनमें भी पर जब बात धर्म की आती है तो संगठित हो जाते हैं दूसरा गुरू हम बनायेंगे मुसलमानों को उनका विधिवत ओआईसी संगठन है कई देशों का सबको पता है कि पाकिस्तान आतंकवाद समर्थन करता हैंं पर धर्म के अनुसार वह भी कबूल है तो मेरे प्यारे भोले भाले हिन्दुस्तानियों गुलामी और नफरत की मानसिक स्थिति से बाहर आकर अपने गुरूओं का अनुसरण करते हुए अन्धकार से प्रकाश की ओर आओ संगठित हो जाओ।
अब हमारे संगठित होने में सबसे बड़ी बाधा आरक्षण व्यवस्था है मित्रो वर्तमान में आरक्षण व्यवस्था का ढांचा सामाजिक नफरत का आधार है और योग्य व्यक्ति को उसका लाभ नहीं मिल रहा है।परम आदरणीय अम्बेडकरजी ने भी कहा था कि कुछ समय बाद यह व्यवस्था बन्द हो जानी चाहिए।माननीय संसद में इस निश्चित रूप से राष्ट्रीय एकता और समता को केन्द्र बिन्दु मानते हुये पुनर्विचार होना ही चाहिए जिससे हमारे देश का प्रतिभा पलायन रोका जा सके और हर क्षेत्र में गुणवत्ता निर्धारित हो।मेरा यह विचार अत्यधिक लोंगो को बुरा लग सकता है अतः गहन चिंतन आवश्यक है मित्रो हमारा देश और संस्कृति अति प्राचीन है हमारे पूर्वजों ने विकासवाद के सिद्धांत के अनुसार हमारी सभ्यता और संस्कृति विकसित की जिसको हम पढेंगे तो अत्यंत गौरवशाली रही है राजतंत्र में भी त्याग और न्याय व्यवस्था अति उत्तम थी मौर्य युग को पढिये अति गौरवशाली है उसके बाद धीरे-धीरे विदेशी आक्रमण शुरू हुये और हम लगभग 1000 अपने अस्तित्व के लिए लड़े जिसमें हमारी परम्परागत सामाजिक,सांस्कृतिक, आर्थिक, धार्मिक व्यवस्थाओं ने विकृत रूप ले लिया।आधुनिक युग में राजतंत्र नष्ट हुए वैश्वीकरण हुआ और विश्व में लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं का उदय हुआ हमारे पूर्वजों ने सही वक्त पर सक्रिय भूमिका निभा कर हमें आजादी दिलाई और उस लड़ाई में हमारे राजाओं का भी योगदान रहा।सरदार वल्लभ भाई पटेल के नेतृत्व में 500 से ऊपर रियासतों का विलय हुआ भारत सरकार में किसी ने संसद में आरक्षण नहीं मांगा क्योंकि वो मौकापरस्त नहीं देश और धर्म का भला चाहते थे सबका अस्तित्व सुरक्षित करना चाहते थे यदि चाहते तो संसद और विधानमंडल में आरक्षण स्थायी ले सकते थे।अब बात करते हैं स्वतन्त्रता सेनानी अधिकतर सामान्य और पिछड़ा वर्ग के ही थे उनकी अगली पीढ़ियों का सर्वेक्षण करवायें तो आपको वस्तुस्थिति समझ में आ जायेगी।मित्रो कब मैं दलित हूँ मैं शोषित हूँ मैं पिछड़ा हूँ और मैं अगड़ा हूँ की मानसिकता में जीते रहोगे जागो और गर्व से कहो मैं भारतीय हूँ मैं हिन्दुस्तानी हूँ मैं इन्डियन हूँ।मेरा माननीय नेतृत्व से निवेदन है कि कोई ऐसा रास्ता निकालिए कि जाति प्रमाण पत्र की आवश्यकता ही समाप्त हो जाए कहीं भी सरकारी संस्थान में जाति चिन्हित करने की आवश्यकता ही न रहे।
इसी के साथ राष्ट्रीय समस्या जातिवाद पर चिन्तन समाप्त।
जय हिंद वन्दे मातरम् ।
सुधीर तिवारी
राजनीति जातिवाद
मित्रो मैं फेसबुक सामाजिक मंच पर सन् 2010 से सक्रिय हुआ था,तकनीक के वरदान और अभिशाप दोनों होते हैं परन्तु सामाजिक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में फेसबुक ने हिन्दुस्तान में एक नया आयाम खड़ा कर दिया है जिसे हम डिजिटल राजनीति कह सकते हैं।इस माध्यम से प्रचार-प्रसार बहुत आसान और सर्वसुलभ हो गया हैं, इन्टरनेट के इस युग में हर व्यक्ति कार्यकर्त्ता हो गया है और भविष्य में राजनीति में रैली,शक्ति प्रदर्शन इत्यादि जो पुराने माध्यम रहे हैं सारे लुप्त होने की सम्भावना हैंं जिससे चुनाव अत्यंत सभ्यता,शान्ति और अत्यधिक कम खर्च में सम्पन्न हुआ करेंगे।2014 और 2019 चुनाव में सोशल मीडिया का अत्यधिक प्रयोग हमे हमारे नेतृत्व से सीधे संवाद स्थापित करने में सफल रहा है और यह देश में राजनीतिक पारदर्शी व्यवस्था का आगाज है।
हमारे देश की राजनीति में जातिवाद और धर्म का प्रयोग लगातार आजादी के बाद अब तक किया जा रहा है,हर देश में किया जाता है परन्तु हमारे यहां लोकतांत्रिक व्यस्था स्थापित होने के साथ ही धीरे धीरे उसे विकृत रूप देने का प्रयास हमारे सभी राजनैतिक दलों द्वारा किया गया जिसका परिणाम उत्तर प्रदेश और बिहार में आम जनता सबसे अधिक हुआ और जातीय नफरत ने सभी जनता के अन्तर्मन को बीमार कर दिया है।
1991 में जब राजनीति में जातिवादी जहर फैलाया जा रहा था तब मैं 15 वर्ष की उम्र में इसका शिकार हुआ था परिणामस्वरूप मेरा विद्यालय बदलना पड़ा था,उसके बाद कई घटनायें हुईं परन्तु मैनें कभी भी न तो सर झुकाया और न ही जातिवादी राजनीति को समर्थन दिया क्योंकि परमपूजनीय गुरूदेव गायत्री परिवार ने कभी ऐसी शिक्षा नहीं दी और उनकी कृपा से ही यह सम्भव हुआ।
वर्ष 2002 में जीवन और मृत्यु के बीच मेरा संघर्ष चल रहा था मात्र 2% अवसर था बचने का मेरा दिल्ली के सभी अस्पतालों ने मना कर दिया था।मेरे परिवार का सबसे बुरा समय था तब मुझे कैलाश अस्पताल मे एडमिट कराया गया राजनैतिक दबाव बनाने वाले थे नवाब सिंह नागर मंत्री भाजपा उत्तर प्रदेश और वेदराम भाटी जिलाध्यक्ष भाजपा नोएडा जो दोनों गुर्जर जाति से थे ।उसके बाद डॉक्टर्स ने ब्लड प्लाज्मा की मांग की तो पहले दिन मुझे प्लाज्मा उपलब्ध कराया एक पोरवाल जी जो वैश्य समाज के हैं,बीच में एक सरदारजी मोजरवेयर कम्पनी के और सातवें और अन्तिम दिन सीताराम सिंह जो क्षत्रिय हैं।लगातार सात दिन अलग अलग जाति के लोगों ने मुझे प्लाज्मा उपलब्ध कराया और जीवनदान दिया मेरी जाति हो गयी मानव की और यह सब प्रबन्धन करने वाले श्री राकेश पोरवाल वैश्य समाज के हैं,इस घटना ने मेरे अन्तर्मन को जातीयता की राजनीति के विरोध में और दृढ़ कर दिया ।
अतऐव विगत विधानसभा चुनाव और वर्तमान लोकसभा चुनाव में आमजन के संगठित होकर जातिवादी राजनीति का विरोध कर मतदान करने से अति प्रसन्नता है।जातिवाद हिन्दुस्तान में एक राष्ट्रीय समस्या के रूप में जन्म ले रहा है जिसको परास्त करने में आंशिक सफलता जनता के संगठित होने से मिली है,यदि सभी राजनीतिज्ञ प्रजा का सहयोग करेंगे तो जातिप्रथा हमारे देश से सती प्रथा की तरह विलुप्त हो जाएगी ।
सुधीर तिवारी
जय हिंद,वन्दे मातरम्
क्रमशः
2)
क्या कहा तुमने जाति प्रथा सती प्रथा की तरह लुप्त हो जायेगी मित्रो परिवार के लोग कहेंगे ये पागल हो गया है वो भी मेरा जन्म तो ब्राह्मण परिवार में जन्म हुआ तो शतप्रतिशत कहेंगे,रिश्तेदार कहेंगे भ्रष्ट हो गया है,समाज के लोग कहेंगे नेता बनना चाहता होगा इसलिए ऐसी बातें कर रहा है,कट्टरपंथी कहेंगे मारो इसको ,राजनीति करने वाले कहेंगे जेल में डालो ये हमारा धन्धा बंद करा देगा ऐसी प्रतिक्रियाओं का सामना करना होगा ।अरे भैया ऐसा कुछ नहीं मैं ऐसा कुछ नहीं करना चाहता मैं केवल संगठित करना चाहता हूं,हर व्यक्ति को उसकी शक्ति बताना चाहता हूँ, लोकतंत्र और आधुनिक राजनीति में संगठन की शक्ति को जगाना चाहता हूँ फिर सवाल उठेगा क्यों संगठित होना चाहते होना चाहते हो? क्रान्ति करनी है,गुंडई करनी है किसी पर दबाव बनाना है।मित्रों ऐसा कुछ भी नहीं करना है हमें इसलिए संगठित नहीं होना है कि सड़कों पर उतरना है,हिंसा फैलाना है,उद्दंडता करनी है या क्रान्ति करनी है हम सब हिन्दुस्तानी लोग अनुशासित हैं हमें संगठित होना है अच्छे कामों के लिए सत्य के लिए, आपस में प्रेम और सहयोग के लिए, सामाजिक न्याय के लिए, सद्भावना के साथ आर्थिक विकास के लिए, स्वयं को शक्तिशाली बनाने के लिए, देश को शक्तिशाली बनाने के लिए, पूरे विश्व में अपनी सभ्यता और संस्कृति को सम्मानित स्थान दिलाने के लिए और सबसे महत्वपूर्ण और आवश्यक कारण होगा हम सभी का संगठित होने का कि हमारे असंगठित होने से कहीं राक्षस हमारे शासक न बन पायें,हमारा शोषण न कर पायें अर्थात हमें राजनीति में उसी को आगे बढाना हैं जो हमें संगठित रख सके।
मित्रो आजादी के बाद संवैधानिक व्यवस्था के लागू होते ही हमें बांटने का कार्य शुरू हो गया था क्योंकि स्वतन्त्रता आन्दोलन हमने संगठित होकर ही लड़ा था और आजादी की कीमत बंटवारे के साथ चुकानी पड़ी थी।आज पुनः जातिवाद और नक्सलवाद राष्ट्रीय समस्याओं के रूप में हमारे सामने खड़ा है।आज हमें परम्परागत राजनीति और आधुनिक राजनीति में एक सामंजस्य बैठाने की आवश्यकता है।हमारा देश एक अति प्राचीन व्यवस्था है पहले राजनीति नहीं होती थी नीति शास्त्र या दर्शन शास्त्र से सामाजिक व्यवस्थायें संचालित होती थीं और ये व्यवस्थायें धर्म के द्वारा नियंत्रित की जाती थीं और वह वर्णाश्रम व्यवस्था थी जिस पर हम बाद में बात करेंगे,उसके बाद राजतंत्र से व्यवस्था चली हजारों साल तक जिसमें शासकों ने अपने स्वार्थ के लिए तरह तरह की वयवसथायें लागू की उसमें से एक है जाति व्यवस्था जिसको हम जन्म से सम्बन्धित करते हैं।हमारे पूर्वजों ने उस वक्त की परिस्थितियों में क्या किया उसमें जो सर्वजन हिताय हो उसे याद रखें और जो बुरा रहा हैं उसे भूल जायें तभी हम सब मिलकर एक सुनहरे भविष्य का सपना देख सकते हैं।
आजादी के बाद हमारे समाज में फैली आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक असमानता के कारण हमारी आपस में ही लड़ाई छिड़ गयी जातियों के नाम पर और अल्पसंख्यक समाज असुरक्षा की भावना से संगठित बना रहा और जिन्होंने संगठित होकर स्वतंत्रता आन्दोलन लड़ा वो असंगठित हो गये,अपनी सकारात्मक ऊर्जा एक दूसरे को नीचा दिखाने में नष्ट की जिसके परिणामस्वरूप छोटे छोटे क्षेत्रीय राजनीतिक दलों का उदय हुआ,जिन्होंने आपके अधिकारों को चंद निजी लोगों में बांटकर राष्ट्रीय राजनीति को पतित किया और निजी स्वार्थों को सर्वोपरि रखते हुए हमें असंगठित करके लोकतन्त्र की आड़ में राजतंत्र चलाकर वंशवाद को पुनर्स्थापित करने का प्रयास किया । हमारे देश की जनता ने उनके सारे राजनीतिक प्रयासों को नकारते हुये वंशवाद को कमजोर करके अपने शिक्षित और जागरूक होने का परिचय दिया।
जाति प्रथा बहुत ही पुरानी है,वर्तमान में कहीं भी छुआछूत नहीं है यदि कोई इस तरह का कृत्य करता है तो दंडनीय है।सभी को अपने कर्म की कीमत मिलती है,और हर जाति का व्यक्ति कोई भी कर्म करने के लिए स्वतन्त्र है हमारे समाज में लगभग हर जाति संगठित है,बहुत अच्छी बात है संगठन में हमें सुरक्षा और शक्ति मिलती है,अब हमारे पास दो रास्ते हैं या तो जाति के नाम पर संगठित होकर आपस में लड़े अन्यथा धर्म के नाम पर संगठित होकर अच्छे नेतृत्व को चुनें।धर्म के नाम पर जातियों के संगठित होने में दो बाधायें बहुत बड़ी हैं एक तो अन्तर्जातीय विवाह और आरक्षण ऐसा मेरा अनुभव कहता है।आरक्षण एक संवैधानिक व्यवस्था है उस पर नेतृत्व को निर्णय करना है, असहमति से हुए अन्तर्जातीय विवाह नफरत फैलाते हैं क्योंकि हमारे देश की संस्कृति में परिवार व्यवस्था विश्व की सामाजिक वयवसथाओं में सर्वोच्च है और हमें गर्व है।आज भी हमारे यहाँ कानयकुबज ब्राह्मण, सरयूपारीय में और हम उनमें विवाह नहीं करते एक दूसरे को नीचा दिखाने का कार्य करते हैं।वैश्वीकरण के वर्तमान दौर में कुछ घंटो में हम पूरे विश्व का भ्रमण कर सकते हैं,दुनिया इंसान की मुठ्ठी में है मोबाईल में है तो मित्रों हमें क्या करना है प्रेम करना है,सहयोग करना है,एक दूसरे को नीचा नहीं दिखाना है,दो व्यक्तियों की लडाई को जातीय लड़ाई में परिवर्तित नहीं होने देना है अन्ततः संगठित रहना है,शक्तिशाली बनना है राष्ट्र को शिक्षित और शक्तिशाली बनाना है।
संघं शरणम गचछामि ।
जय हिंद वन्दे मातरम् ।
सुधीर तिवारी
क्रमशः
3)
संघं शरणम गचछामि ।
मित्रो संगठित हो जाओ,क्या बात कर दी आपने हमारी सामाजिक व्यवस्था असफल है वर्तमान में हम सैकड़ो वर्षों से जातियों के नाम पर बटे हुये हैं।आपस में एक दूसरे से नफरत करना,हर शक्तिशाली और संगठित समाज द्वारा असंगठित और कमजोर का शोषण करना यही धर्म बन गया है,आज एकाकी परिवार व्यवस्था आयी है जिसमें दो सगे भाई आपस में प्रेम से नहीं रह सकते हैं और आप संगठित होने की बात करते हैं।ऐसा बिल्कुल नहीं है मित्रो आप ध्यान से गहराई में देखिये पूर्वोत्तर की व्यवस्था के सारे अभिशाप वरदान के रूप में परिवर्तित हो रहे हैं,हमें शासकों ने कर्म के आधार पर विभिन्न जातियों में विभाजित किया कि हम उनके विरोध में संगठित न रहें,हमने क्या किया अपनी परिवार व्यस्था विवाह और अन्य संस्कारों से सुरक्षित कर ली और समाज में छोटे समूहों में संगठित होकर अपने अपने समाज को सुरक्षित रखते हुये भारतीय संस्कृति को संरक्षित करने का महान कार्य किया।सभी को साधुवाद क्योंकि आपने देवताओं वाला कार्य किया अपनी सभ्यता,संस्कृति और संस्कारों को संरक्षण देने के लिए संगठित हो गये,आपने देश आजाद कराया संगठित होकर स्वतन्त्रता दिलायी और क्या किया आपने आधुनिक शिक्षा का अनुसरण करके अत्यधिक परिश्रम करके सामूहिक रूप से देश को विश्व में एक सम्मानित स्थान पर ला कर खड़ा कर दिया लगभग हर क्षेत्र में वो भी केवल 72 सालों में धर्म और संस्कृति को सुरक्षित रखते हुए आप धीरे धीरे संगठित बने रहे अतः निश्चित रूप से सभी ने देवताओं वाला कार्य किया है मित्रो संगठन की शक्ति को पहचानो।अभी अभी 2019 मेंं आपने क्या किया एनडीए के नेतृत्व में मात्र 45% संख्या संगठित हुयी और परिणाम आज देश मेंं स्थिर और मजबूत सरकार चुन ली अब हो सकता है जिसको आपने चुना है वही आपको विभाजित करने लगें अपने निजी स्वार्थों के लिए,मेरे देवताओं आपको क्या करना है और संगठित हो जाना है 45% को बढ़ाकर 80%कर देना धर्म के नाम पर लेकिन असुरों को तो हराना ही है जीवन ही एक देवासुर संग्राम है,असुरों का शासन हमारे देवताओं ने कभी स्वीकार नहीं किया है हम भी नहीं करेंगे उन्होंने युद्ध किये ये हमारा सौभाग्य है कि हम लोकतांत्रिक व्यवस्था के अन्तर्गत हैं हमें लड़ना नहीं है हमें केवल संगठित रहना है धर्म के लिए देश के लिए और सबसे महत्वपूर्ण अपने कल्याण के लिए अपनी अगली पीढ़ी के लिए हमें ऐसा करना ही होगा ।
मित्रो हमारी वैदिक व्यस्था को जातिवादी रूप देकर उसे पूर्णतः सामाजिक,आर्थिक और राजनीतिक विकृत रूप दे दिया हमारे पूर्वोत्तर शासकों ने जो वर्तमान में हमारे असंगठित होने सबसे महत्वपूर्ण कारण है इन सबसे ऊपर है ईश्वरीय व्यवस्था जिसके अन्तर्गत परिवर्तन प्रकृति का नियम है और उसी नियम के अनुसार हमें स्वतन्त्रता के साथ हमें लोकतांत्रिक व्यवस्था मिली जिसमें हर व्यक्ति समान अधिकार धारण करता है।
भ्रष्टाचार और निजी स्वार्थों के चलते राजनीति ने उसे विकृत रूप देकर हमें सवर्ण, पिछड़ा, दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक विभिन्न वर्गों में विभाजित कर दिया और नफरत फैलाने का प्रयास किया और आपके अधिकारों को चन्द लोगों में बांट दिया क्योंकि आप असंगठित थे।अब हम देवता असुरों की राजनीति का शिकार नहीं होंगे हम संगठित रहेंगे धर्म के नाम पर और देश के कल्याण के लिए मित्रो हम पहले कोशिश करेंगे की हम 45% से 80% संगठित हों आपसी मतभेदों को त्यागकर हमें संगठित होना ही उसके बाद हम 100% संगठित होने का प्रयास करेंगे देवताओं की संख्या बढायेंगे ।
जय हिंद वन्दे मातरम् ।
सुधीर तिवारी
क्रमशः
4)
मित्रो पूर्व के लेखों में हमने संगठित होने की बात पर बात की क्योंकि सारे महान और रचनात्मक कार्य संगठन की शक्ति से ही सम्भव हुये हैं,अब समस्या यह आती है कि हम संगठित क्यों हो संगठित तो भेड़ें होती हैं शेर तो अकेला चलता हैं अरे भाईयो एवं बहिनों भेड़ों के संगठित चलने का उद्देश्य भोजन और सुरक्षा होता है हमारे संगठन का उद्देश्य देश और धर्म की रक्षा होगा क्योंकि उनके सुरक्षित होने से हमारी सुरक्षा सुनिश्चित हो जायेगी और हम प्रगतिशील हो जायेंगे अब सवाल यह आता है कि यह सैद्धांतिक लक्ष्य तो हर संगठन और राजनीतिक दल रखता है पर व्यवहारिक रूप में हमारी सद्भावनायें जो देवताओं के सिद्धांत से मिलती हैं उनको मतदान के रूप में परिवर्तित करके पुनः आम जनता पर शासक बनकर विभाजन का सिद्धांत लागू कर देते हैं और हमारा शोषण प्रारम्भ हो जाता है ऐसी व्यवस्था के हम सभी आदी हो गये हैं।अब ऐसा हम नहीं होने देंगे क्योंकि हम लोकतांत्रिक व्यवस्था के महत्वपूर्ण अंग हैं अब हम शिक्षित और जागरूक नागरिक हैं,हम केवल चुनाव के दौरान ही जागरूक और सक्रिय नहीं रहेंगे हम प्रतिदिन सूचना के माध्यमों से अपने अधिकारों,धर्म,संस्कृति, राजनीति और देश के प्रति जागरूक रहेंगे और नकारात्मकता से दूर रहते हुये हर जनप्रतिनिधि के कार्य और आचरण का तार्किक और व्यवहारिक विश्लेषण अवश्य करेंगे,हम राजनीतिक रूप से हमेशा जागरूक और सक्रिय रहेंगे।मित्रो बिना राजनीति के एक परिवार की व्यवस्था भी नहीं चल सकती है अतः हम अपने परिवार प्रबन्धन की व्यवस्था के अनुसार राजनीतिक विश्लेषण अवश्य करेंगे,परिवर्तन होके रहेगा यदि हम अच्छे उद्देश्य के लिए संगठित रहेंगे यही संगठन की शक्ति है।
अब सवाल यह है कि हमारे संगठित होने में बाधा क्या है तो मित्रो सबसे बड़ी बाधा है हमारा जातिवाद जो वर्तमान में एक राष्ट्रीय समस्या बनती जा रही है,दूसरी बाधा है आरक्षण व्यवस्था, तीसरी बाधा है असहमति से हुये अन्तर जातीय विवाहों से सामाजिक विद्वेष,चौथी बाधा है जातिगत लड़ाईयां और ऐतिहासिक पूर्वाग्रह इत्यादि छोटे छोटे कई कारण हैं।हमारे देश का इतिहास अति प्राचीन और गौरवशाली होने के नाते हमें परम्परागत राजनीति और आधुनिक राजनीति में एक सामंजस्य बैठाना होगा सारे हल निकल आयेंगे,आधुनिक राजनीति में हमारा समाज संवैधानिक रूप से तीन तरह विभाजित है सामान्य वर्ग, पिछड़ा वर्ग और दलित /आदिवासी समाज और इन तीनों को एक सूत्र में बांधने का कार्य धर्म करता है अतः धर्म का अनुसरण पारदर्शिता के साथ यदि कराया जाय तो हमारी सामाजिक एकता को कोई नुकसान नहीं पहुंचा सकता है और यह कार्य हमारे धर्मगुरु करने में सक्षम हैं अब यदि हमारे राजनेता निजी स्वार्थों को त्यागकर आरक्षण व्यवस्था जिसका मूल उद्देश्य सामाजिक,आर्थिक और राजनीतिक रूप से पिछड़े समाज को देश की मुख्य धारा से जोड़ना है,उस व्यवस्था को पारदर्शी बनाकर उसके मूल उद्देश्य पर केन्द्रित करें तो हमारी एकता स्थायी और अखंड हो सकती है।परन्तु हमारे धार्मिक,सामाजिक और राजनीतिक नेतृत्व से ऐसी आशा अभी तक सम्भवतः कोई नहीं करेगा क्योंकि उनकी तो दुकानें बंद हो जायेंगी तब उस स्थिति में यह कार्य आम जनता को ही करना होगा और आपके हथियार क्या होंगे शिक्षा, जागरूकता, आपस में प्रेम मतलब सहनशीलता,स्वस्थ प्रतिस्पर्धा जिनसे हम संगठित रहकर ईमानदार,जिम्मेदार और देशभक्त जनप्रतिनिधि ही चुनेंगे धीरे-धीरे व्यवस्था परिवर्तित हों जायेगी ।
अब हम बात करेंगे असहमति से हुये अन्तर जातीय विवाह समाज और परिवार में विघटन करते हैं मित्रो आज भी हमारे देश की 80% आबादी ग्रामीण क्षेत्र में रहती है और 20%आबादी जो शहरों में गांव-देहात से जुड़ी है और हमें गर्व है कि लगभग 99%आबादी हमारे परम्परागत संस्कार और संस्कृतियों का पालन करती है और आज भी विवाह हमारे देश में दो परिवारों का आपसी जुड़ाव होता है,जिसने भी एकाकी परिवार व्यवस्था को अपनाया है वह अवसादग्रस्त है।अतः मित्रो हमें करना है असहमति से हुये अन्तर जातीय विवाह से बचना है और यदि होते हैं तो विवाद नहीं होने देना हैं, यह संवेदनशील है हमारे देश में समझदारी से हल निकालना है या तटस्थ रहना है।जातीय लड़ाई जो दो व्यक्तियों के बीच की लड़ाई होती है जमीन के कारण,धन के कारण, अहंकार या क्रोध अन्य कई कारण होते हैं जो जातिवादी झगड़े के रूप में परिवर्तित हो जाते हैं उनसे बचना हैंं या तटस्थ रहना है,हम संगठित होकर रहेंगे ऐसा मन में भाव रखने से ही आधी समस्यायों पर विजय प्राप्त कर लेंगे।
ऐतिहासिक पूर्वाग्रह पर अगले लेख में
जय हिंद वन्दे मातरम् ।
सुधीर तिवारी
क्रमशः
5)
ऐतिहासिक पूर्वाग्रह का प्रयोग जातिवादी राजनीति में सर्वाधिक किया गया है जिसके परिणामस्वरूप उत्तर प्रदेश और बिहार गन्दी राजनीति के शिकार होकर आज बीमारू राज्यों की श्रेणी में आ गये क्योंकि उन्हें संगठित नहीं रहने दिया गया और विभाजित करने में सर्वाधिक प्रयोग पूर्वाग्रह का किया गया उदहारण के तौर पर ब्राह्मणों ने गलत शिक्षा दी,क्षत्रियों ने शोषण किया,वैश्य समाज ने लूट लिया सभी ने शूद्र समाज का शोषण किया।मित्रो मैं मानता हूँ कि हमारे पूर्ववर्ती व्यवस्थाओं में राजतंत्र व्यवस्था थी बाहुबल सर्वोपरि था अतः पारदर्शिता नहीं थी हिंसा,षड्यंत्र और पारिवारिक व्यवस्थाएं हावी थीं अतः हर शक्तिशाली व्यक्ति कमजोर का शोषण करता था,आपस में युद्ध,अहंकार की लड़ाईयां होती थीं।संभवत हमारी व्यवस्थायें पतित और विकृत रूप ले चुकीं थीं जिसके परिणामस्वरूप सैकड़ों वर्षों तक हम गुलाम रहे और गुलामी के दौरान शासकों ने अपने निजी स्वार्थों के लिए हमारी सभ्यता संस्कृति और व्यवस्थाओं को अत्यधिक विकृत रूप दे दिया जिसका मुख्य उद्देश्य था कि हम संगठित न रहें हम कमजोर रहें।मित्रो जब जातिवाद की बात आती है तो हमारी वर्णाश्रम व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न लगाये जाते हैं मित्रो जातिवाद हमारी राजतंत्र की उत्पत्ति है जिसमें पचासों जातियों में हमें विभाजित किया गया पहले कर्म के अनुसार फिर निजी स्वार्थ के चलते जन्म के अनुसार अब जन्म के अनुसार कार्य विभाजन निश्चित रूप से प्रतिभा का शोषण और सामाजिक बुराई के रूप में स्थापित हो गया।
मित्रो वर्णाश्रम व्यवस्था हमारे ॠषियों द्वारा प्रतिपादित की गयी वैदिक सामाजिक व्यवस्था है और आज भी पूरा विश्व उसी व्यवस्था के अनुरूप कार्य कर रहा है अतः हमारी वैदिक व्यवस्था ॠषियों के हजारों वर्षों के शोध के उपरांत प्रतिपादित हुई है और आज भी उतनी ही जीवन्त है,दैवीय है और सदा सत्य है,सार्वभौमिक है उसी आधार पर हमारे आचार्यों ने वसुधैव कुटुम्बकम का सूत्र दिया था।मित्रो हमारी वर्ण व्यवस्था में गुण कर्म और स्वभाव के अनुसार ही चार वर्णों में हमें विभाजित किया गया है।भगवान् श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भागवत गीता के अठारहवें अध्याय में इसका वर्णन किया है जो वेदों का सार है कृपया पढ़ें तो आपके बहुत सारे भ्रम दूर हो जायेंगे और मैं चुनौती देता हूँ पूरे विश्व के ज्ञानियों को कि हमारी उस व्यवस्था को गलत सिद्ध कर के बताओ सारा विश्व आज भी उसी दर्शन के अनुरूप विभाजित और क्रियान्वित है और यह सत्य है कि पूरे विश्व में शक्तिशाली लोग कमजोर का शोषण कर रहे हैं।मित्रो जो ज्ञान,त्याग, करूणा,सत्य,दया के मार्ग पर चलते हुये समाज को शिक्षित और दिशानिर्देश देते हुये सर्व कल्याण हेतु आविष्कारों में अपने जीवन का अधिकतम समय देता है वह ब्राह्मण हैं, जो शूरवीर,नेतृत्व करने वाला,मनुष्यता और धर्म की रक्षा के लिए सहर्ष बलिदान को तैयार वह क्षत्रिय है,जो कृषि कार्य,व्यापार और अर्थव्यवस्था के द्वारा मानवता और विश्व के कल्याण के लिए रोजगार सृजन करे वह वैश्य और जो इन तीनों के अनुसार कार्य करे वह शूद्र वर्ण है और इनका जन्म से कोई सम्बन्ध नहीं है और मैं शतप्रतिशत आत्मविश्वास के साथ कह सकता हूँ कि समस्त विश्व इन्हीं वर्णों में विभाजित है ये है हमारी वैदिक व्यवस्था और हमें इस पर गर्व है।मित्रो हम इतना विवरण सहित चर्चा इसलिए कर रहे हैं क्योंकि हमें परम्परागत राजनीति और आधुनिक राजनीति में एक सामंजस्य बैठाने की आवश्यकता है तभी हम संगठित हो सकते हैं।आज सभी हिन्दुस्तानियों को श्रीमद्भागवत गीता पढ़ने की आवश्यकता है जिससे हम अपनी संस्कृति को करीब से समझ सकें और गौरवान्वित होकर संगठित रह सकें और यदि ऐसा नहीं करोगे तो पुनः महाभारत करो और सामाजिक,मानसिक और आर्थिक गुलाम बनने को तैयार रहो।अतः सभी संकल्प लें कि हम पूर्वाग्रहों को त्यागकर संगठित रहेंगे और राष्ट्रीय समस्या जातिवाद को अपने समाज,देश और विश्व से समाप्त करने में अपना योगदान देंगे।
जय हिंद वन्दे मातरम् ।
सुधीर तिवारी
क्रमशः
6)
मित्रो पिछले पांच अंको में हमने कई बिन्दुओं पर विचार करते हुये आधुनिक भारतीय राजनीति में राष्ट्रीय समस्या के रूप में इस्तेमाल हो रही हमारी सामाजिक जाति व्यवस्था पर चिन्तन किया और निष्कर्ष यह निकाला कि यदि हम संगठित हो गये तो हमारा शोषण न्यूनतम होता जायेगा।अभी वर्तमान के चुनाव परिणाम मात्र 45% संगठित होने का परिणाम है कि नेतृत्व दबाव में है पर वह हमें संगठित नहीं देखना चाहता है मित्रो एक तरफ हमसे मतदान की अपील धार्मिक एकता के नाम पर करता है बंगाल में सत्ता पक्ष के खिलाफ जय श्रीराम के नारे का प्रयोग करता है संगठित करने के लिए दूसरी ओर धर्म के नाम पर वजीफा और कट्टरपंथी शिक्षा को बढ़ावा देने की घोषणायें करना हमारे शीर्ष नेतृत्व को कटघरे में खड़ा करता है और हमारे शासन की पारदर्शिता को संदेहास्पद करता है,यह पूर्ण अलोकतांत्रिक है और अदूरदर्शी है।अब भविष्य की राजनीति में हमारे पास विकल्प क्या हैं पहला विकल्प है 45%के विरोध में 55%संगठित हो जायें लेकिन हमारे क्षेत्रीय दल परिवारवादी नेतृत्व,बाहुबली नेता,जातीय संगठन, धार्मिक संगठन इत्यादि जो धन से प्रबंधन किये जाते हैं वो ऐसा होने नहीं देंगे और हमें नफरत के साथ पूंजीवाद का शोषण झेलना ही होगा।दूसरा विकल्प यह है कि 45% को बढ़ाकर 80%धार्मिक एकता करते हुए परिवारवाद और जातिवाद को नकारते हुये ईमानदार,जिम्मेदार सर्वधर्म समभाव राष्ट्रवादी वर्तमान से बेहतर विपक्ष बनाया जाय जिसमें योग्य वंशवादी राजनीतिज्ञ धरातल से जुड़े हुए और देशभक्त उद्योगपति भी शामिल हों केवल राष्ट्र प्रथम वाली जमीनी संगठन बनायी जाये तो जो परिस्थितियां उत्पन्न हो रही हैं उनसे निपटा जा सकता है और कोई रास्ता नहीं है।मित्रो हमारा लक्ष्य 80% संगठित होने का है,20% स्वयं सही हो जायेंगे यही संगठन की शक्ति अतः संगठित बनो,शिक्षित बनो,शक्तिशाली बनो मेरा वादा है मित्रो यदि ऐसा कर लिया तो शतप्रतिशत सत्यमेव जयते होगा हिन्दुस्तान पूरे विश्व में सम्मानित होगा,महान बनेगा आप महान बनेंगे आपकी अगली पीढ़ियां और महान होंगी,सभ्य होंगी ।
जय हिंद वन्दे मातरम् ।
सुधीर तिवारी
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मित्रो अब बात करेंगे कि 80%लोग संगठित कैसे होंगे ये कार्य असंभव है ऐसा नहीं हो सकता है ये मानसिकता हमारे जेहन में स्थायी रूप ले चुकी है क्योंकि हम लगभग 1000 साल गुलाम रहे हैं अपनी सारी ऊर्जा अपने अपने अस्तित्व को बचाने में ही लगाते रहे हैं और जब आजादी मिली तो सवर्ण,पिछड़ा और एससी/एसएसटी में बंटकर अपनी रचनात्मक ऊर्जा लड़ने में नष्ट की परिणाम में लोकतन्त्र की आड़ में राजतंत्र खड़ा हो गया।अब वक्त आ गया है संगठित होने का 80% और उसके लिए हमें गुरू की आवश्यकता होगी तो नजर उठा कर देखिए गुरू हमारे आसपास ही हैं बस हमें उनसे सीखना है कौन हैं गुरू वही जिन्होंने अपने बुद्धि कौशल से आप पर राज किया है मित्रो हम गुरू बनायेंगे ईसाईयों को विश्व का सबसे बड़ा समुदाय है भिन्न भिन्न मत हैं उनमें भी पर जब बात धर्म की आती है तो संगठित हो जाते हैं दूसरा गुरू हम बनायेंगे मुसलमानों को उनका विधिवत ओआईसी संगठन है कई देशों का सबको पता है कि पाकिस्तान आतंकवाद समर्थन करता हैंं पर धर्म के अनुसार वह भी कबूल है तो मेरे प्यारे भोले भाले हिन्दुस्तानियों गुलामी और नफरत की मानसिक स्थिति से बाहर आकर अपने गुरूओं का अनुसरण करते हुए अन्धकार से प्रकाश की ओर आओ संगठित हो जाओ।
अब हमारे संगठित होने में सबसे बड़ी बाधा आरक्षण व्यवस्था है मित्रो वर्तमान में आरक्षण व्यवस्था का ढांचा सामाजिक नफरत का आधार है और योग्य व्यक्ति को उसका लाभ नहीं मिल रहा है।परम आदरणीय अम्बेडकरजी ने भी कहा था कि कुछ समय बाद यह व्यवस्था बन्द हो जानी चाहिए।माननीय संसद में इस निश्चित रूप से राष्ट्रीय एकता और समता को केन्द्र बिन्दु मानते हुये पुनर्विचार होना ही चाहिए जिससे हमारे देश का प्रतिभा पलायन रोका जा सके और हर क्षेत्र में गुणवत्ता निर्धारित हो।मेरा यह विचार अत्यधिक लोंगो को बुरा लग सकता है अतः गहन चिंतन आवश्यक है मित्रो हमारा देश और संस्कृति अति प्राचीन है हमारे पूर्वजों ने विकासवाद के सिद्धांत के अनुसार हमारी सभ्यता और संस्कृति विकसित की जिसको हम पढेंगे तो अत्यंत गौरवशाली रही है राजतंत्र में भी त्याग और न्याय व्यवस्था अति उत्तम थी मौर्य युग को पढिये अति गौरवशाली है उसके बाद धीरे-धीरे विदेशी आक्रमण शुरू हुये और हम लगभग 1000 अपने अस्तित्व के लिए लड़े जिसमें हमारी परम्परागत सामाजिक,सांस्कृतिक, आर्थिक, धार्मिक व्यवस्थाओं ने विकृत रूप ले लिया।आधुनिक युग में राजतंत्र नष्ट हुए वैश्वीकरण हुआ और विश्व में लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं का उदय हुआ हमारे पूर्वजों ने सही वक्त पर सक्रिय भूमिका निभा कर हमें आजादी दिलाई और उस लड़ाई में हमारे राजाओं का भी योगदान रहा।सरदार वल्लभ भाई पटेल के नेतृत्व में 500 से ऊपर रियासतों का विलय हुआ भारत सरकार में किसी ने संसद में आरक्षण नहीं मांगा क्योंकि वो मौकापरस्त नहीं देश और धर्म का भला चाहते थे सबका अस्तित्व सुरक्षित करना चाहते थे यदि चाहते तो संसद और विधानमंडल में आरक्षण स्थायी ले सकते थे।अब बात करते हैं स्वतन्त्रता सेनानी अधिकतर सामान्य और पिछड़ा वर्ग के ही थे उनकी अगली पीढ़ियों का सर्वेक्षण करवायें तो आपको वस्तुस्थिति समझ में आ जायेगी।मित्रो कब मैं दलित हूँ मैं शोषित हूँ मैं पिछड़ा हूँ और मैं अगड़ा हूँ की मानसिकता में जीते रहोगे जागो और गर्व से कहो मैं भारतीय हूँ मैं हिन्दुस्तानी हूँ मैं इन्डियन हूँ।मेरा माननीय नेतृत्व से निवेदन है कि कोई ऐसा रास्ता निकालिए कि जाति प्रमाण पत्र की आवश्यकता ही समाप्त हो जाए कहीं भी सरकारी संस्थान में जाति चिन्हित करने की आवश्यकता ही न रहे।
इसी के साथ राष्ट्रीय समस्या जातिवाद पर चिन्तन समाप्त।
जय हिंद वन्दे मातरम् ।
सुधीर तिवारी