धर्म और राजनीति 6
मित्रो आज हम धर्म से विकसित हुई सभ्यता और संस्कृति पर चर्चा करेंगे क्योंकि अक्सर एक मुद्दा समाज में उठता है कि संस्कृति का पतन हो रहा है जबकि वह जेनरेशन गैप होता है जिसे सांस्कृतिक परिवर्तन कह सकते हैं सदैव परिवर्तनशील हैं उसको रोकना असंभव हैं विकास की प्रक्रिया ही बाधित हो जायेगी।
पाश्चात्य दर्शन और भारतीय दर्शन संस्कृति में केवल एक शब्द का अंतर हैं और सत्य यह है कि पाश्चात्य दर्शन भी अति प्राचीन भारतीय दर्शन की ही एक शाखा है जिसे चार्वाक दर्शन के नाम से जानते हैं।
धर्म,अर्थ,कर्म और मोक्ष भारतीय धर्म,संस्कृति एवं दर्शन का समस्त क्षेत्र चार स्तम्भों पर है और पाश्चात्य दर्शन धर्म, अर्थ, कर्म के तीन स्तम्भों पर टिका है बस एक शब्द मोक्ष हमें समस्त विश्व की संस्कृति से भिन्न करता है और वही हमारी शक्ति है एवं यही सच्ची हिंदू संस्कृति है।
परमात्मा तो निर्विवाद है,विवाद का कारण तर्क है😁शरीर है आत्मा है एवं आत्मा परमात्मा का ही अंश है इसलिए सभी धर्म मानवता का संदेश देते हैं।धर्म,अर्थ और कर्म तो लगभग हर व्यक्ति के जीवन से सीधा जुड़ा हुआ है परंतु मोक्ष शब्द पाश्चात्य अथवा विज्ञान स्वीकार नहीं करेगा😂।
मोक्ष अर्थात् बंधन से मुक्त और पाश्चात्य संस्कृति बंधन स्वीकार ही नहीं करती है।जब संस्कृति की बात आती है तो समाज परिधान,भाषा,रंग,शक्ल,खानपान इत्यादि से संबद्ध करता है भैया यह सब तो वातावरण और उपलब्धता एवं मनुष्य के मष्तिष्क की रचनात्मकता पर निर्भर है,इन बातों का संस्कृति से कोई सम्बन्ध नहीं है।
हमारे भारत में जन्म हुआ अम्मा का दुग्धपान करके उनकी गोद में खेलना शुरू हुआ पालने में नहीं यह संस्कृति है।जन्म से लेकर जब तक हवन पूजन करके अस्थि विसर्जन न कर दें और बाप एक ही रहे यह संस्कृति है।स्कूल में,मोहल्ले में किसी लड़की से दोस्ती करने की सोचो और बहिन की जासूस टीम घर में बताकर पूजन करा दे यह संस्कृति है।शादी-ब्याह का मतलब हंगामा मरते दमतक और मरने के बाद भी भूतनी बनकर भी साथ रहे पत्नी पति यह संस्कृति है।एक ही घर दूसरे के बने बनाए काम में फटे में टांग अड़ा दो और दाँत निपोरकर कहना पड़े कोई बात नहीं यही संस्कृति है।तुमसे ज्यादा तुम्हारे बारे में दोस्तों को जानकारी हो और तुम खींसे निकालने के सिवा कुछ न कर सको क्योंकि दोस्त हैं यह संस्कृति है।कुल मिलाकर भारतीय संस्कृति में जन्म से मृत्यु तक स्वतंत्रता नाम की चीज है ही नहीं बुढ़ापे में भी अलग तरह के खूंटे है मित्रो और इन्हीं में आनंद है प्रेम है उत्सव हैं नकारात्मकता के लिए कोई समय ही नहीं।
भारतीय दर्शन एवं संस्कृति उत्सवों की संस्कृति हैं यदि सकारात्मक रहेंगे अन्यथा बंधन हैं।😊
पाश्चात्य संस्कृति में स्वतंत्रता है पर अकेलापन है एवं शरीर और आत्मा का सम्बंध है भैया जीवन भर स्वतंत्र रहे शरीर को दफन कर दिया आत्मा का बंधन उस स्थान से कर दिया आत्मा कभी मुक्त नहीं होगी मृत्युलोक में ही विचरण करेगी।पाश्चात्य दर्शन वालों को शोध करना ही चाहिए।
भारतीय संस्कृति में पूरे जीवन बंधन के साथ आनंद एवं उत्सव हैं जिसे हम परिवार व्यवस्था कहते हैं,विश्व में सर्वोत्तम सामाजिक व्यवस्था है।जैसे ही मृत्यु हुई समस्त प्रियजन आंखो के सामने जलाकर राख बनाते हैं कोई मोह नहीं शरीर से महाज्ञान है तब भी तसल्ली नहीं मिलती राख अस्थि ले जाकर जल में विधिवत् विसर्जित करते हैं,शतप्रतिशत गारंटीड योजना है मोक्ष दिलाने की पंचतत्वों से निर्मित शरीर का पंचतत्वों में विलय आत्मा मुक्त होकर परमात्मा में समाहित हो जाए।
भारतीय संस्कृति ऋषियों द्वारा विकसित पूर्ण वैज्ञानिक संस्कृति है मानो तो मोक्ष है न मानो तो भटकते रहो हां थोड़ा बहुत इन्द्रियों का सुख अधिक ले सकते हो।
सुधीर तिवारी
विश्व शांति भारत ट्रस्ट🙏
मित्रो आज हम धर्म से विकसित हुई सभ्यता और संस्कृति पर चर्चा करेंगे क्योंकि अक्सर एक मुद्दा समाज में उठता है कि संस्कृति का पतन हो रहा है जबकि वह जेनरेशन गैप होता है जिसे सांस्कृतिक परिवर्तन कह सकते हैं सदैव परिवर्तनशील हैं उसको रोकना असंभव हैं विकास की प्रक्रिया ही बाधित हो जायेगी।
पाश्चात्य दर्शन और भारतीय दर्शन संस्कृति में केवल एक शब्द का अंतर हैं और सत्य यह है कि पाश्चात्य दर्शन भी अति प्राचीन भारतीय दर्शन की ही एक शाखा है जिसे चार्वाक दर्शन के नाम से जानते हैं।
धर्म,अर्थ,कर्म और मोक्ष भारतीय धर्म,संस्कृति एवं दर्शन का समस्त क्षेत्र चार स्तम्भों पर है और पाश्चात्य दर्शन धर्म, अर्थ, कर्म के तीन स्तम्भों पर टिका है बस एक शब्द मोक्ष हमें समस्त विश्व की संस्कृति से भिन्न करता है और वही हमारी शक्ति है एवं यही सच्ची हिंदू संस्कृति है।
परमात्मा तो निर्विवाद है,विवाद का कारण तर्क है😁शरीर है आत्मा है एवं आत्मा परमात्मा का ही अंश है इसलिए सभी धर्म मानवता का संदेश देते हैं।धर्म,अर्थ और कर्म तो लगभग हर व्यक्ति के जीवन से सीधा जुड़ा हुआ है परंतु मोक्ष शब्द पाश्चात्य अथवा विज्ञान स्वीकार नहीं करेगा😂।
मोक्ष अर्थात् बंधन से मुक्त और पाश्चात्य संस्कृति बंधन स्वीकार ही नहीं करती है।जब संस्कृति की बात आती है तो समाज परिधान,भाषा,रंग,शक्ल,खानपान इत्यादि से संबद्ध करता है भैया यह सब तो वातावरण और उपलब्धता एवं मनुष्य के मष्तिष्क की रचनात्मकता पर निर्भर है,इन बातों का संस्कृति से कोई सम्बन्ध नहीं है।
हमारे भारत में जन्म हुआ अम्मा का दुग्धपान करके उनकी गोद में खेलना शुरू हुआ पालने में नहीं यह संस्कृति है।जन्म से लेकर जब तक हवन पूजन करके अस्थि विसर्जन न कर दें और बाप एक ही रहे यह संस्कृति है।स्कूल में,मोहल्ले में किसी लड़की से दोस्ती करने की सोचो और बहिन की जासूस टीम घर में बताकर पूजन करा दे यह संस्कृति है।शादी-ब्याह का मतलब हंगामा मरते दमतक और मरने के बाद भी भूतनी बनकर भी साथ रहे पत्नी पति यह संस्कृति है।एक ही घर दूसरे के बने बनाए काम में फटे में टांग अड़ा दो और दाँत निपोरकर कहना पड़े कोई बात नहीं यही संस्कृति है।तुमसे ज्यादा तुम्हारे बारे में दोस्तों को जानकारी हो और तुम खींसे निकालने के सिवा कुछ न कर सको क्योंकि दोस्त हैं यह संस्कृति है।कुल मिलाकर भारतीय संस्कृति में जन्म से मृत्यु तक स्वतंत्रता नाम की चीज है ही नहीं बुढ़ापे में भी अलग तरह के खूंटे है मित्रो और इन्हीं में आनंद है प्रेम है उत्सव हैं नकारात्मकता के लिए कोई समय ही नहीं।
भारतीय दर्शन एवं संस्कृति उत्सवों की संस्कृति हैं यदि सकारात्मक रहेंगे अन्यथा बंधन हैं।😊
पाश्चात्य संस्कृति में स्वतंत्रता है पर अकेलापन है एवं शरीर और आत्मा का सम्बंध है भैया जीवन भर स्वतंत्र रहे शरीर को दफन कर दिया आत्मा का बंधन उस स्थान से कर दिया आत्मा कभी मुक्त नहीं होगी मृत्युलोक में ही विचरण करेगी।पाश्चात्य दर्शन वालों को शोध करना ही चाहिए।
भारतीय संस्कृति में पूरे जीवन बंधन के साथ आनंद एवं उत्सव हैं जिसे हम परिवार व्यवस्था कहते हैं,विश्व में सर्वोत्तम सामाजिक व्यवस्था है।जैसे ही मृत्यु हुई समस्त प्रियजन आंखो के सामने जलाकर राख बनाते हैं कोई मोह नहीं शरीर से महाज्ञान है तब भी तसल्ली नहीं मिलती राख अस्थि ले जाकर जल में विधिवत् विसर्जित करते हैं,शतप्रतिशत गारंटीड योजना है मोक्ष दिलाने की पंचतत्वों से निर्मित शरीर का पंचतत्वों में विलय आत्मा मुक्त होकर परमात्मा में समाहित हो जाए।
भारतीय संस्कृति ऋषियों द्वारा विकसित पूर्ण वैज्ञानिक संस्कृति है मानो तो मोक्ष है न मानो तो भटकते रहो हां थोड़ा बहुत इन्द्रियों का सुख अधिक ले सकते हो।
सुधीर तिवारी
विश्व शांति भारत ट्रस्ट🙏
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