धर्म और राजनीति 5
मित्रो पिछले लेखों में हमने सैद्धांतिक और आदर्शवाद के मानकों पर धर्म के सिद्धांतों पर चर्चा की जिसमें हमें धर्म में राजनीति की आवश्यकता कहीं समझ में नहीं आयी,धर्म का एक स्तम्भ नीति निर्धारण है जिसके अनुसार व्यक्ति निर्माण से विश्व निर्माण की प्रक्रिया एक विश्वास के द्वारा सम्भव है।
अब हम वर्तमान और व्यवहारिक धर्म के स्वरूप का विश्लेषण करते हैं,निश्चित रूप से हम आत्म निरीक्षण सर्वश्रेष्ठ करेंगे क्योंकि उसकी हमें जानकारी हैं वह हमारी जीवनशैली है।हमारे सनातन धर्म का मूल संदेश हैं श्रद्धा एवं विश्वास और हमारे धर्म का आधार वेद हैं।उपनिषद कहते हैं कि परमात्मा ही है एवं समस्त विश्व यह स्वीकार करता है कि परमात्मा निर्विवाद है।
भैया जब हम आम आदमी की जीवनशैली देखेंगे तो पायेंगे कि श्रद्धा और विश्वास है परंतु अज्ञान के कारण अंधश्रद्धा एवं अंधविश्वास के द्वारा स्वयं अपना शोषण करवा रहा है।
उदहारण के तौर पर हम भोलेनाथ को लेते हैं परमपिता परमेश्वर आदियोगी,आदिनाथ,आदिनर्तक,आदिवैद्य ये समझ लो जो कुछ सब महाकाल से सबकुछ शिवतत्व है।एक लाईन में यूं समझ लीजिए सत्यम शिवम सुंदरम हो गया परमात्मा का साक्षात्कार पहले सत्य के मार्ग पर चलिए तो आनंद ही आनंद है,अज्ञानी बच्चा सत्य मार्गी होता है अथवा महाज्ञानी पंडित सतय मार्गी होता है आप न बच्चे हैं और न पंडित और शिव तत्व को बताओगे कि संहार कर देंगे,भस्म कर देंगे,तांडव करेंगे तो धरती हिलेगी, तीसरी आंख खोल देंगे तो भूकंप आ जायेगा चोर हो बेईमान हो भगवान् के नाम पर भोले लोगों में भय व्याप्त करते हो।
भोलेनाथ से अधिक कौन प्यार कर सकता हैं भैया तुम जहर चढ़ाओ और प्रसन्न ठीक हैं, मित्रो तीसरी आँख को ले लो बहुत सारे मिल जायेंगे बोलेंगे हम दूर से देख लेंगे बाबाजी का घंटा देख लोगे ठग हो और यदि देख भी लोगे तो हमें क्या देखो खोलकर दिखा दो।शिवजी की तीन आँखे जो हमारे शास्त्रों में वर्णित हैं उनका अर्थ है आदिदैविक,आदिभौतिक एवं आध्यात्मिक और जो तीसरी आँख है वह आध्यात्मिक है अर्थात अंतरयात्रा स्वयं को जानो,स्वयं को पहचानो,तुम शरीर नहीं आत्मा हो परमात्मा का अंश शिव का अंश।ध्यान करो👍
मूर्ख कहीं के आज्ञा चक्र पर राख रगड़ने से तीसरी आंख खुलेगी फिर बाथरूम और बेडरूम में झांकने की शक्ति मिल जाएगी साले उललू के पटठे धर्म को अंध श्रद्धा में बर्बाद कर दिया।
अंध श्रद्धा और अंधविश्वास अकेले हमारे धर्म की समस्या नहीं समस्त विश्व में इसका उपयोग भय और भ्रम एवं एक दूसरे को नीचा दिखाने में किया जाता है और सभी धर्म के लोग करते हैं कहते हैं चमत्कार है अरे मनुष्य का जन्म मिला इससे बड़ा क्या चमत्कार होगा,पशु नहीं बने इतना चमत्कार कम है क्या मौज लो डराते क्यों हो।
अब हमें अन्य धर्मों का अधिक ज्ञान नहीं है परंतु इतना अवश्य है कि समाज को दिशा देने वाली शक्तियों में नकारात्मक शक्तियों ने अच्छी खासी घुसपैठ करके धर्म के पहले स्तम्भ नीति को धर्म के ही दूसरे स्तम्भ के द्वारा अत्यंत नुकसान पहुँचाया है।
वैश्वीकरण के इस वर्तमान दौर में हम अपनी आवश्यकताएं पूरी करते हुए अपने कर्तव्यों का निर्वहन यदि करते हैं और परमात्मा को याद रखते हैं,इतना ही धर्म पर्याप्त है क्योंकि यदि परमात्मा हृदय में है तो सब ठीक ही करोगे अन्यथा वह करवा लेगा ऐसा मेरा विश्वास ही नहीं अनुभव भी है।
धर्म का दूसरा स्तम्भ ऊर्जा है,यांत्रिक ऊर्जा के बहुत पहले मनुष्य ने आध्यात्मिक ऊर्जा का अहसास किया और स्वयं को परमात्मा की संतान घोषित किया,मनुष्य अनंत ऊर्जा का श्रोत है यह शतप्रतिशत सत्य है अभी विज्ञान ने प्रकृति और जीव के अत्यंत अल्प रहस्य उद्घाटन कर पाये हैं और उपभोक्तावाद में उलझकर मरने मारने पर तैयार हैं, यही सत्य है धर्म के लिए कोई युद्ध नहीं हुए हैं जब हम इतिहास पढ़ेंगे तो युद्ध और हिंसा का मुख्य कारण अहंकार,भोग,साम्राज्य विस्तार,लूट और वर्तमान में व्यापार है।
मित्रो जब धर्म में ऊर्जा की बात आयेगी तो तंत्र,मंत्र,यंत्र का नाम अवश्य आयेगा।सभी धर्म इन चीजों में लिप्त हैं और वर्तमान में जो वैज्ञानिक हैं वह स्वीकार भी हैं,अधिक ज्ञान नहीं है परंतु इन्हीं माध्यमों से समस्त विश्व में नकारात्मक शक्तियाँ भय व्याप्त कर शोषण करने का कार्य और अंध श्रद्धा फैलाने का कार्य करती हैं।
जबकि सभी का मूल उद्देश्य प्रार्थना है,अपने इष्ट को किसी एक विधि के द्वारा प्रसन्न करना और सबका मंगल हो की कामना करना है।हम सब तो परमात्मा को याद रखें बस सबकी सामूहिक प्रार्थना की शक्ति से ही परमात्मा नकारात्मक शक्तियों को सकारात्मक कर देंगे।
कर भला तो हो भला सीधा सा मंत्र है,सदैव सकारात्मक रहिए परमात्मा स्वयं आपके अंदर विराजित हैं।
धर्म नीति और ऊर्जा का सकारात्मक संतुलन है,श्रद्धा और विश्वास परमात्मा पर रखिए।
सभी बिंदुओ पर हल्का विश्लेषण करने के बाद मेरा व्यक्तिगत विचार यह है कि धर्म में राजनीति की आवश्यकता नहीं हैं बल्कि अनुचित है।
अगले लेख में राजनीति में धर्म की आवश्यकता पर चर्चा होगी।
सुधीर तिवारी
विश्व शांति भारत ट्रस्ट🙏
मित्रो पिछले लेखों में हमने सैद्धांतिक और आदर्शवाद के मानकों पर धर्म के सिद्धांतों पर चर्चा की जिसमें हमें धर्म में राजनीति की आवश्यकता कहीं समझ में नहीं आयी,धर्म का एक स्तम्भ नीति निर्धारण है जिसके अनुसार व्यक्ति निर्माण से विश्व निर्माण की प्रक्रिया एक विश्वास के द्वारा सम्भव है।
अब हम वर्तमान और व्यवहारिक धर्म के स्वरूप का विश्लेषण करते हैं,निश्चित रूप से हम आत्म निरीक्षण सर्वश्रेष्ठ करेंगे क्योंकि उसकी हमें जानकारी हैं वह हमारी जीवनशैली है।हमारे सनातन धर्म का मूल संदेश हैं श्रद्धा एवं विश्वास और हमारे धर्म का आधार वेद हैं।उपनिषद कहते हैं कि परमात्मा ही है एवं समस्त विश्व यह स्वीकार करता है कि परमात्मा निर्विवाद है।
भैया जब हम आम आदमी की जीवनशैली देखेंगे तो पायेंगे कि श्रद्धा और विश्वास है परंतु अज्ञान के कारण अंधश्रद्धा एवं अंधविश्वास के द्वारा स्वयं अपना शोषण करवा रहा है।
उदहारण के तौर पर हम भोलेनाथ को लेते हैं परमपिता परमेश्वर आदियोगी,आदिनाथ,आदिनर्तक,आदिवैद्य ये समझ लो जो कुछ सब महाकाल से सबकुछ शिवतत्व है।एक लाईन में यूं समझ लीजिए सत्यम शिवम सुंदरम हो गया परमात्मा का साक्षात्कार पहले सत्य के मार्ग पर चलिए तो आनंद ही आनंद है,अज्ञानी बच्चा सत्य मार्गी होता है अथवा महाज्ञानी पंडित सतय मार्गी होता है आप न बच्चे हैं और न पंडित और शिव तत्व को बताओगे कि संहार कर देंगे,भस्म कर देंगे,तांडव करेंगे तो धरती हिलेगी, तीसरी आंख खोल देंगे तो भूकंप आ जायेगा चोर हो बेईमान हो भगवान् के नाम पर भोले लोगों में भय व्याप्त करते हो।
भोलेनाथ से अधिक कौन प्यार कर सकता हैं भैया तुम जहर चढ़ाओ और प्रसन्न ठीक हैं, मित्रो तीसरी आँख को ले लो बहुत सारे मिल जायेंगे बोलेंगे हम दूर से देख लेंगे बाबाजी का घंटा देख लोगे ठग हो और यदि देख भी लोगे तो हमें क्या देखो खोलकर दिखा दो।शिवजी की तीन आँखे जो हमारे शास्त्रों में वर्णित हैं उनका अर्थ है आदिदैविक,आदिभौतिक एवं आध्यात्मिक और जो तीसरी आँख है वह आध्यात्मिक है अर्थात अंतरयात्रा स्वयं को जानो,स्वयं को पहचानो,तुम शरीर नहीं आत्मा हो परमात्मा का अंश शिव का अंश।ध्यान करो👍
मूर्ख कहीं के आज्ञा चक्र पर राख रगड़ने से तीसरी आंख खुलेगी फिर बाथरूम और बेडरूम में झांकने की शक्ति मिल जाएगी साले उललू के पटठे धर्म को अंध श्रद्धा में बर्बाद कर दिया।
अंध श्रद्धा और अंधविश्वास अकेले हमारे धर्म की समस्या नहीं समस्त विश्व में इसका उपयोग भय और भ्रम एवं एक दूसरे को नीचा दिखाने में किया जाता है और सभी धर्म के लोग करते हैं कहते हैं चमत्कार है अरे मनुष्य का जन्म मिला इससे बड़ा क्या चमत्कार होगा,पशु नहीं बने इतना चमत्कार कम है क्या मौज लो डराते क्यों हो।
अब हमें अन्य धर्मों का अधिक ज्ञान नहीं है परंतु इतना अवश्य है कि समाज को दिशा देने वाली शक्तियों में नकारात्मक शक्तियों ने अच्छी खासी घुसपैठ करके धर्म के पहले स्तम्भ नीति को धर्म के ही दूसरे स्तम्भ के द्वारा अत्यंत नुकसान पहुँचाया है।
वैश्वीकरण के इस वर्तमान दौर में हम अपनी आवश्यकताएं पूरी करते हुए अपने कर्तव्यों का निर्वहन यदि करते हैं और परमात्मा को याद रखते हैं,इतना ही धर्म पर्याप्त है क्योंकि यदि परमात्मा हृदय में है तो सब ठीक ही करोगे अन्यथा वह करवा लेगा ऐसा मेरा विश्वास ही नहीं अनुभव भी है।
धर्म का दूसरा स्तम्भ ऊर्जा है,यांत्रिक ऊर्जा के बहुत पहले मनुष्य ने आध्यात्मिक ऊर्जा का अहसास किया और स्वयं को परमात्मा की संतान घोषित किया,मनुष्य अनंत ऊर्जा का श्रोत है यह शतप्रतिशत सत्य है अभी विज्ञान ने प्रकृति और जीव के अत्यंत अल्प रहस्य उद्घाटन कर पाये हैं और उपभोक्तावाद में उलझकर मरने मारने पर तैयार हैं, यही सत्य है धर्म के लिए कोई युद्ध नहीं हुए हैं जब हम इतिहास पढ़ेंगे तो युद्ध और हिंसा का मुख्य कारण अहंकार,भोग,साम्राज्य विस्तार,लूट और वर्तमान में व्यापार है।
मित्रो जब धर्म में ऊर्जा की बात आयेगी तो तंत्र,मंत्र,यंत्र का नाम अवश्य आयेगा।सभी धर्म इन चीजों में लिप्त हैं और वर्तमान में जो वैज्ञानिक हैं वह स्वीकार भी हैं,अधिक ज्ञान नहीं है परंतु इन्हीं माध्यमों से समस्त विश्व में नकारात्मक शक्तियाँ भय व्याप्त कर शोषण करने का कार्य और अंध श्रद्धा फैलाने का कार्य करती हैं।
जबकि सभी का मूल उद्देश्य प्रार्थना है,अपने इष्ट को किसी एक विधि के द्वारा प्रसन्न करना और सबका मंगल हो की कामना करना है।हम सब तो परमात्मा को याद रखें बस सबकी सामूहिक प्रार्थना की शक्ति से ही परमात्मा नकारात्मक शक्तियों को सकारात्मक कर देंगे।
कर भला तो हो भला सीधा सा मंत्र है,सदैव सकारात्मक रहिए परमात्मा स्वयं आपके अंदर विराजित हैं।
धर्म नीति और ऊर्जा का सकारात्मक संतुलन है,श्रद्धा और विश्वास परमात्मा पर रखिए।
सभी बिंदुओ पर हल्का विश्लेषण करने के बाद मेरा व्यक्तिगत विचार यह है कि धर्म में राजनीति की आवश्यकता नहीं हैं बल्कि अनुचित है।
अगले लेख में राजनीति में धर्म की आवश्यकता पर चर्चा होगी।
सुधीर तिवारी
विश्व शांति भारत ट्रस्ट🙏
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